अरुण कुमार की दिल से लिखी बात महिला दिवस शुभकामनाएं |
रोजखबर डेस्क :कहने को कह लो महिला दिवस की शुभकामनाएं मगर लड़कियों पर सवाल करना आज भी बवाल करता है लड़कियों का जवाब देना आज भी हमें चोट पहुंचाता है बाहर की लड़कियों को बहादुर करने वाले को बोल्ड गर्लफ्रेंड तो चाहिए बोल्ड पत्नी नहीं वो कैरेक्टर लेस कहलाएगी उस बोल्ड लड़की से बतियाना टाइम पास करना सबको भाता है लुभाता है मगर उसी बोल्ड अवतार में खुद के घर की बहन बेटी नहीं सुहाती किसी कामयाब महिला के बारे में पुरुष ही नहीं महिलाएं भी कहती सुन ली जाती है अरे अपनी खूबसूरती का गलत फायदा उठा कर वहां तक पहुंच गई एक लड़की की कि 4 लड़कों से दोस्ती उसके चरित्र पर सवाल है मगर एक लड़के का 10 जगह मुंह मारना कोई सवाल आज भी नहीं उठाता आज भी किसी लड़की का सिंगल रहना क्रिमिनल से कम नहीं होता शादी आज भी बहुत बड़ा सवाल है और शादी ना करना जरूर किसी के चक्कर होगा या उल्टी-सीधी होगी जैसे चरित्र प्रमाण पत्रों के लिए पर्याप्त है औरतें अकेली हो कम तक रहोगी तुम्हारी भी जरूरत होगी यह समझाते हुए करीब आने की कोशिश करना हल लंपट मतलबी दिलासा देने वाले पुरुष की पहेली प्राथमिकता होती है कभी बेटी बोलकर कभी बहन बोलकर कभी भाभी बोल कर बहुत कुछ ऐसा है जो 24 घंटे दिमाग को मत्ता रहता है तीखा कड़वा है कुछ ज्यादा ही आज महिला दिवस पर इतना तो बनता है आईना दिखाना एक लाइन में कहा जाए तो महिला दौड़ा जीवन स्वभाविक तौर पर ही नहीं जी पाती है वैसे वह भावुक है इसलिए साहसी है और इसलिए प्रेक्टिकल नहीं हो पाती लड़कियों जिसके साथ भावनात्मक रिश्ते से जुड़ी है 100 प्रतिशत भावनात्मक ही है जिससे प्रेक्टिकली जुड़ी है तो प्रेक्टिकली ही रहेगी मगर इसके 201 सबसे बड़ी दीवार शरीर की है जिसे बोल्डनेस आधुनिकता के नाम पर गाना सुना तो कई चाहते हैं मगर सामाजिक कार्यकर्ता देने में परहेज रखते हैं वह दिन जल्दी आए इस देश में जब महिला कोच्चि माल जैसी बेजान अपमाओ से नवाज ने के बजाय सिर्फ महिला नहीं उसके पूरे वजूद के साथ इंसान माना समझा जाए हम आपका यह काम करवा रहे हैं आप हमें क्या देगी जैसे दी अर्थी सवाल कामकाजी महिलाओं के सामने कुछ अजीब सी निगाहों के साथ आते रहते हैं हैं मगर सामाजिक स्वीकार्यता देने में परहेज भरते हैं वह दिन जल्दी आए इस देश में जब महिलाओं को चीज माल जैसी बेजान उपमाओं से नवाज ने की बजाय सिर्फ महिला नहीं उसके पूरे वजूद के साथ इंसान माना समझा जाए हम आपका यह काम करवा रहे हैं आप हमें क्या देगी जैसे दिल अर्थी सवाल कामकाजी महिलाओं के सामने कुछ अजीब सी निगाहों के साथ आते रहते हैं पिंक जैसी एक नहीं हजारों फिल्म बन जाए तब भी लड़की ना शेर मैं खोई रहेगी और वही दुश्चिंता ही कहलाती रहेगी शब्दों का रूप बदलता रहेगा मॉर्डन जमाने के हिसाब से बस यह समाज है जहां एक तरफ मां बहन भाभी की पूजा करने का दम भरने वाले जरा सी बात पर गालियां भी मां बहन भाभी कोही देते हैं कई बार देखा है लड़कों को लड़कियों की बेवफाई का रोना रोते हुए बुराई करते हुए उनका मजाक बनाते हुए लड़कियों को ऐसा करते नहीं सुना ना देखा होगा देखा भी होगा तो बहुत कम सैकड़ों लोगों के ग्रुप में एक एक पुरुष एक लड़की को टारगेट करता रहे तो कुछ नहीं लड़की पलट कर जवाब देती तो वह उसे पुरुष की बेज्जती हो जाती है पहल खुद करनी है फिर यह भी कहना है वह पीछे ही पड़ गई यार इस पोस्ट से बहुत तो लोग चोटिल होंगे पर महिला दिवस है यार बहुत कुछ है जो चलता रहता है अगले साल तक के लिए छोड़ देते हैं शायद 1 साल मैं कुछ बदल जाए फिर मानसिकता ही शांति से निष्पक्षता से सोचिए समाज के इस दोगलेपन के बारे में याद रखिए बेटियां घर से निकली है आपको उन पर भरोसा है मगर भेड़िए मतलबी संता बना देने वाले लोग कई रूप में है चाहे 1 साल की बच्ची हो या 7 साल की वृद्ध उसके साथ गंदा काम करने वाले परिचित रिश्तेदार दोस्त ही होता है सच कहूं तो अब घर घर के सगे रिश्तो के अलावा बाहर के किसी भी मुंहबोले पर भरोसा करने का मन नहीं करता वैसे इन हालात के लिए महिलाएं भी उतनी ही दोषी है जितने पुरुष को बढ़ावा वह भी देती है इस दोगलेपन मतलबी दिलासा देने वाले लोग को अपनी खामोशी से महिलाओं को पुरानी बातें स्कूल कॉलेज की बातें याद दिला कर हां में हां मिला कर उनके जज्बातों के साथ खेलना यह दोगलेपन कि लोग की बात में हां में हां मिलाना यह हमारी बेटी मां भाभी की कमजोरी रही है क्योंकि वह बचपन के यार हैं दोस्त हैं क्या कहूं कि जब शरीर पर नहीं आत्मा पर लगे हैं क्योंकि कदम कदम पर बहुरूपिए मतलवी सांत्वना देने वाले ठगी करने वाले लोगों की कमी नहीं है समाज मे |

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